sidhanth

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Saturday, October 31, 2009

इच्छाओं के समंदर

इच्छाओं के समंदर से कुछ मोती निकालने की सोची हमने
पर इन सनातन हवाओं, परम्पराओं ने
न जाने कैसा बनाया है हमें जो
करता है
सदैव तर्क
अच्छा बुरा, सही गलत
होती है हमें भी दुविधा से असुविधा
पर जब से सोचने-समझने का काम
शिराओं में दौड़ते खून ने लिया
दिमाग को जैसे जबरदस्ती वी आर एस दे दिया गया हो
अब तो काम करने से डरता है दिमाग
पिछली बार सोचने की कोशिश पर
कितना मारा था शिराओं के ख़ूनों ने उसे
भिगो-भिगो के पीटा था
शरीर के बीचो-बीच चौराहे पर
छुप के बैठा रहता है दिमाग अब तो
खोपड़ी के पिछले कोटर में
गुजरात के अल्पसंख्यकों की तरह
कोटर के चारो ओर अटखेलियाँ करते
शिरों के खून पसीना-पसीना कर जाते है उसे
जब तक आरती और अजानों की दुआ सलाम होती थी
जब तक मंदिर वाली गली के फूलों का
मजार पर चढ़ना मना नहीं था
जब तक ख़ुदा के महल में राम रहते थे
जब तक धुली जाती थी कबीर की चदरिया
सरयू के पानी में
तब तक कहा जाता था
आदमी सोचता है दिमाग से
करता और जीता है दिमाग से
दिल की बेकार बातों को टाल देता है यूँ ही
जैसे अपने देश का किसान
टाल देता है अपने बीवी की
अगले फगुआ पर लुग्गा लाने की बात
पर किसने बढ़ाई
शिराओं के ख़ून की हिम्मत
वही तो कहता था
भुजाओं से कड़कने को
नथुनों से फड़कने को
सोचता है दिमाग
क्यों कहा था शिराओं से
खूब भेजों हृदय को खून
ताकि साँस न फूले
गुम्बदों पर चढ़ने में
इक छोटी सी भूल पर
वनवास मिल गया दिमाग को
गर सोचने की कोशिश करता हुआ पकड़ा गया तो
दे देंगे अज्ञातवास शिराओं के ख़ून
काश ख़त्म हो जाते नज़र बंदी के दिन
पर इक नारे वाला बच कर निकला है
अंधे कानून को न जाने क्या दिखाकर
गर फिर उबाल ला दिया
शिराओं के खून में उसी ने
उम्र कैद न हो जाये मुझको।

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