sidhanth

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Wednesday, November 28, 2012

दिवाली

लहक गयी चावल जल गयी कढाई ...तबे ने भी मुह बिचकाई छोलनी का भी मुह होगया है काला और कल्चल ने उसका खूब मजाक है उड़ाया चाकू साला नीठ्ला सुबह से सो रहा है और चूल्हा आहे ले रहा है सोच रहा हूँ क्या बनायु ...फीर याद आया और मैंने इस दिवाली भी सोकर हिन् काम चलाया

समसान

आजकल हमारा अक्स हिन् हमसे खफा रहने लगा है कल रात उसने आईने के सामने ये बात कही हमसे हमने कफा की वजह पूछी तो उसने आईने से हमारा वजूद हिन् मिटा डाला कभी सोचता हूँ समसान में कुछ पल गुजारूं उन बेजुबानो के साथ कितना सुकून होगा उन्हें धरती से लिपट कर रहने में यहाँ तो फलों के बीज भी दो पल टिकते हैं कैसे वो सुकून से रहता होगा अन्दर बिना खुले हवे के न बारिश की बूंद ..न चमकती धुप की रौशनी न अपनों का साथ बस एक खमोशी कभी कभी कोई आजाता होगा आसपास कुदाल चलाने और दे जाता होगा एक दोस्त उन्हें ... कैसे वो बात करते होंगे उन पत्थरो से ..क्या कोई आवाज जाती होगी वहां कैसा खामोश बस्ती बना रखा है उन्होंने और हम यहाँ ऊपर जिंदे होकर भी ख़ामोशी के साथ जी रहे हैं सोचता हूँ कुछ पल गुजारूं उन बेजुबानो के साथ बिना खुले हवे के बिना रौशनी के ..बिना तुम्हारे जो सायद यहीं कहीं दफ़न हो मेरे यादों के साथ ...काश कोई इन पत्थरों को हटा ता तो मैं भी जान पाता कितना कुछ दबा हैं सायद जो काश कभी मेरा होपाता अब नहीं ... काश ....उन दो सब्दों के बिना जीवन आज भी अधूरी है कल भी बिन तेरे

चिट्टी

काश हम भी उन्हें चिट्टी लिखते काश हम भी कभी उन्हें वो कह्पाते जो कई बार आँखों ने तो बोला पर जुब़ा गिरफतार होगई थी उनके नजरो की कई बार ..कई बार हमने लिखा भी वो जो सायद बोल नहीं पाता पर कलम खामोश हिन् रही और दिल पे मन की जुबा से लिखते रहे हम कई बार सोचा की तुम्हे बोलूं की खुले बाल में अछि लगती हो पर हर बार मैं उन लटों की उलझन में हिन् उलझा रहा कई बार दोस्तों ने कहा की बोल दो उसे और मैंने हर बार येही बोला किस्मत में लिखी होगी तो मिलेगी नहीं तो हमने कईयों की डोली उठाई है अपने हांथो से

संस्कृति

हमारी संस्कृति और घोटाले में चोली दामन का बहूत पुराना हमारी संस्कृति और घोटाले में चोली दामन का बहूत पुराना इतिआश है ..जरा ध्यान दे ..कई मुल्को ने और कई देशो ने हमपे हमला किया पर कोई हमारी संस्कृति बदल पाई नहीं ..हम आज भी वही हैं जो आने वाले कई वर्षो तक ऐसे हिन् रहेंगे वही मंदिर में जाना वही प्राथना होगी ..वही कुरान होगा वही गीता के श्लोक होंगे और वही नेता भी होंगे ..जो देश को पिछले ६० वर्षों से लुट रहे हैं ...पर मुझे दुःख इस बात का नहीं की घोटाले हो रहे हैं और क्या प्रमाण की आने वाली सरकार ऐसा नहीं करेंगी ..इंसान वर्षों से लुट कर खा रहा है और वो खायेगा हिन् ...सो ये सोचना की वो सही और गलत है ये चीजे अब कल्पना से परेन और किताबों में हिन् मिलेंगे एक आदर्श आदमी के उधारण...लोग कहते हैं की सरकार ने 2G में पैसा खाया है पर आप हिन् सोचिये क्या सरकार ने वर्षों से चली आ रही कुछ कम्पैनियन का समराज्य तोडा है जिससे हम आज कम पैसों में बात कर पाते हैं ...ऐसे बहूत से मुद्दे हैं जिसपर सोचने का वक़्त है न की सरकार को मुजरिम कहना ....(ये मेरा निजी विचार है ..अगर किसी की भावना को चोट पौन्चती है तो मैं माफ़ी मांगता हूँ ) ...वक़्त आरोप का नहीं वक़्त है बदलने का ....भारत भाग्यविधाता है और रहेगा ...आप इस कथन को जैसे ले ..पर मैं देश की म्हणता में हिन् लेता हूँ इसे

नफरत

नफरत बड़ी काम की होती है अगर हो जाये तो आदमी भगवन से भी लड़ बैठता है और प्यार हो तो उस रब के आगे भी घुटने टेक देता है ...मुझे तेरी नफरत हिन् पसंद है जो न तुझे जीने देगी और मैं तो कब से इस तेरे नफरत पे मर मिटा हूँ ....बस राह खोज रहा हूँ ...आज तेरे सेहर से भी नफरत होगई है मुझे और सुना है की ...पूरा सहर नफरत की दीवानगी में जल रहा है

मेघा

यूँ छाई है मेघा आसमान में हमारे अरमानो की बारिश हो रही है २ बूंद गिरी टूट कर वो आसमान से हमारे हंथेलियों पर बिखर गयी जैसे कुछ सिमटा हिन् न हो भींग रही है वसुधरा ने कहा हमसे न पकड़ो इसे बह जाने दो टूट कर इसे

मन

ये मन बड़ा विद्रोही है ...कई बार हमने इसके विद्रोह को रोकने की कोशिश की पर ये विद्रोह हर दिन बढ़ता जा रहा है ...